Thursday, October 7, 2010

यू डर्टी इंडियन्स!

यह जुमला तब से चला आ रहा है जबसे गोरे लुटेरे आ कर देस पर काबिज हो गए थे. वही लाद कर गए हैं कि खबरदार, आगे जब हम अपने गुलामों के खेल करवाएंगे, तब तुम्हारे देस को भी इस में शामिल होना होगा. हमारे देस के कर्णधारों ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी. हम पूरी खेलभावना के साथ इन 'गुलाममंडल" खेलों में शामिल होते आये. इस साल के लिए तो बीड़ा ही उठा लिया कि हम कराएंगे खेल! असल खेल तो इन खेलों के शुरू होने के बहुत पहले से चले और खेल खेल में आयकरदाताओं का बहुत सा पैसा बिना डकार लिए हजम कर लिया गया. यह दूसरी बात है कि खाने-खाने के इस खेल में खाने में लगे लोग भूल गए कि असल खेल भी कराने हैं, और इस चक्कर में लेट हो गए. लेटलतीफी का वह आलम था कि 'आवन लगे बरात तो ओटन लगे कपास' वाली कहावत भी फीकी पड़ गई. 


तैयारी के दौरान एक और बड़ा सवाल था, सफ़ाई का. पहले चरण में तो जनता के पैसे पर हाथ साफ़ किया गया, बड़ी सफ़ाई के साथ. फिर आया सफ़ाई का दूसरा चरण. कहा जाता है कि देस में तो बड़ी गन्दगी है. अब हमें अगर अपना कचरा पहली सहूलियत वाली जगह पर फेंकने की आदत है तो किसी को परेशानी क्यों होती है? हमारा तो राष्ट्रीय कर्त्तव्य सा है कि घर को साफ़ रखिये, और अपना कचरा घर के ठीक सामने, या बगल के खाली प्लॉट में उलट दीजिए. ऐसा करने से अपना घर तो साफ़ हो जाता है. फिर पूरा देस पड़ा तो है कचरा डालने के लिए. और, कचरा अगर जहाँ-तहाँ नहीं डालेंगे तो इतने सारे कचरा बीनने वाले बच्चे बेकार नहीं हो जायेंगे? कितने लोगों की रोजी रोटी चलती है इस कचरे से! काहे को इतने सारे लोगों के पेट पर लात मारना?  फिर हमारे देस की जनसंख्या भी तो इतनी है कि क्या करें? 
जब खेलों की प्लानिंग होनी शुरू हुई तो बात आयी गन्दगी की समस्या की. अब क्या है कि हम देसियों को तो गन्दगी से कोई समस्या नहीं है, बल्कि हमें तो गन्दगी से प्रेम है. इतना प्रेम है कि अपने घर तक में, हर दीवाली हम सारे घर का कचरा निकालते हैं, और उसे धो-पोंछ कर वापस यथास्थान रख देते हैं. पर यहाँ गड़ड़ यह थी कि इन खेलों के दौरान बाहर से आने वाले गोरों को इस गन्दगी पर नाक-भौं सिकोड़ने और देस को एक और गाली दे कर मन में प्रसन्न होने का मौका मिल जाता. अब हम देसी सब कुछ बर्दाश्त कर सकते हैं, यहाँ तक कि गन्दगी भी, पर अब इतने देसभक्त तो हम लोग हैं ही कि गोरों को और प्रफुल्लित होने का कोई कारण नहीं देना चाहेंगे. 


तो सवाल था गन्दगी का. किसी जोधपुरीधारी को यह भान हुआ कि हमारा देस  ('दिल्ली', क्योंकि ज्यादातर दिल्लीवालों और बड़े जोधपुरीधारियों के लिए 'भारत' और 'दिल्ली' पर्यायवाची हैं) तो बड़ी गंदी अवस्था में है. इस चिंता में जोधपुरीधारियों ने सफ़ारी वालों को भी लपेट लिया. अचानक अब सारा वातावरण गंदा हो गया और हुक्मरानों और बाबुओं को पूरी दिल्ली गंदी दिखने लगी. अब, गन्दगी का एक सबसे सरल और समय बचाऊ समाधान है जो हर देसी जानता है और अभिमन्यु की तरह शायद माँ के पेट से सीख कर अवतरित होता है. वह समाधान यह है कि कचरा समेट कर कालीन के नीचे सरका दिया जाए. इसी तर्ज़ पर दिल्ली के किसी सफ़ारी वाले बाबू ने सुझाया कि गन्दगी होती है दो कारणों से. एक तो भिखारियों के कारण, जो गंदे कपड़े या चीथड़े पहनते हैं और गंदे से दिखते ही हैं, और दूसरे, रेहड़ी-ठेले वालों के कारण. सड़कछाप लोग आ कर इन रेहड़ियों पर गंदी चीज़ें खाते हैं, और उनका गन्दा कचरा आस-पास फ़ेंक देते हैं. सबसे पहले तो दिल्ली के तमाम भिखारियों को चुन चुन कर शहरबदर दिया गया क्योंकि वे देस का 'इम्प्रेसन' खराब कर देते. ऐसा कर देने मात्र से भिखारियों की समस्या सुलझ गई. अरे हाँ, उन बड़े, सबसे गंदे भिखारियों को इससे बख्श दिया गया जो हर पांच साल में भीख मांगते हैं और दिल्ली की एक गोल इमारत पर काबिज़ रहते हैं. 


उसके बाद बारी आई रेहड़ी-ठेले वालों की. इनको भी दिल्ली के बाहर किया गया, ताकि दिल्ली साफ़ रहे. गन्दगी का प्रमुख स्रोत, रेहड़ी वाले कम से कम इन खेलों तक के लिए दिल्ली से लतिया दिए गए. अब ये और बात है कि बहुत से गरीब छात्र (देसी छात्र सदा गरीब ही होते आये हैं, चाहे फटे कपड़ों में स्कूल जाने वाले और लैम्प-पोस्ट की रोशनी में पढ़ने वाले हों, या पिता को ए.टी.एम. मशीन मान कर डिज़ाइनर कपड़ों, लेटेस्ट मोबाइल और सबसे पावरफुल बाइक पर घूमने वाले क्यों न हों), मजदूर, निम्न-आय-वर्गी जन (पिज्जा हट और बरिस्ता अफोर्ड नहीं कर सकने वाले) भी इन्हीं रेहड़ी वालों की बदौलत कुछ खा पी पाते हैं. पर ऐसे लोगों की चिंता देस के सफारी वाले बाबू लोग करने लग गए तब तो हो गया काम. तो, हुआ यह कि भिखारी और रेहड़ी-खोमचे  वाले दिल्ली-बदर कर दिए गए. दिल्ली शहर साफ़ हो गया, तो एक तरह से पूरा देश साफ़ हो गया. दिल्ली छोड़ और तो कहीं खेलों के दौरान आने वाले ये गोरे जाने वाले थे नहीं,  इसलिए सफ़ारी वालों और जोधपुरी वालों की सफ़ाई की चिंता दूर हुई.  


पर होनी और ईश्वर को कुछ और ही मंज़ूर था. इतनी मेहनत की गई, इतनी सारी सफ़ाई कर ली गई, फिर भी, सरकारी और निजी टारगेट के चलते चालान करने पर उतारू ट्रैफिक पुलिसवाले (कोड का नाम: मामा)  की तर्ज़ पर निरीक्षण के लिए देस आने वाले गोरों ने गन्दगी को ढूँढ ही निकाला. इतनी गन्दगी ढूँढ निकाली गई कि, जितनी थी नहीं, उतनी गन्दगी निकल आयी. जिस किसी जगह को देखा गया, वहीं पर गन्दगी निकल आई. कहा गया कि सब कुछ गन्दा है. सदा खबर की तलाश में रहने वाले सत्यान्वेषी चैनलों और कॉन्ट्रेक्ट न मिल पाने से खिसियाये कुछ अखबार वालों ने भी इन गोरों के सुर में सुर मिला कर "सुर बने हमारा" गाने वाले अंदाज़ में न केवल दिल्ली को, बल्कि पूरे देस को देसभक्ति के साथ, और पूरी दुनिया तक को ईमानदारी से बताया कि यहाँ तो सचमुच ही बड़ी गन्दगी है और गोरे खिलाड़ियों  और खेल प्रेमियों के स्वास्थ्य को जानलेवा खतरा है! पहले से मानो देस आने वाले गोरों को पड़ोस-प्रशिक्षित आतंकवादियों से जान का खतरा कम नहीं था कि अब गन्दगी से भी जान का खतरा हो गया.


ये और बात है कि सफ़ाई-पसंद गोरों और उनके उन खिलाडियों ने आज सफ़ाई बरकरार रखने की मुहिम और रोग-मुक्त रहने के चक्कर में खेल गाँव के टॉयलेट कॉन्डोम भर भर के जाम कर दिए हैं. (खबर पढ़ने के लिए लिंक पर क्लिक करें) 


और इसका क्या करें कि कोई खुराफ़ाती देसी, सफ़ाईप्रेमी गोरों के देश से, बड़ी सफ़ाई से ये फोटुएं उतार लाया? आप भी देखिये, कितनी सफ़ाई है गोरों के इस देश में!






अब कोई क्या करे? सब गन्दा है पर धंधा है ये!!



Monday, September 27, 2010

माँ

यह न केवल एक सत्य घटना है, अपितु मेरा स्वयं का अनुभव भी है. 
 
जाड़े की सुबह और कडाके की ठण्ड! बरफ इस बार कुछ देर से पिघल रही थी और मौसम ख़ासा ठंडा ही था. यूँ मुझे ठण्ड ज़रा कम ही लगती है पर वह दिन ऐसे कुछ दिनों में से था कि मुझे भी सर्दी का अहसास हो रहा था. वैसे तो मुझे चाय-कॉफी की कोई आदत नहीं है पर इच्छा होने पर या अधिक ठण्ड लगने पर पी लेता हूँ. मन हुआ कि एक कॉफी मार ही ली जाए. 
 
इस इच्छा से मैं हमारे विश्वविद्यालय के यूनिवर्सिटी सेंटर की ओर बढ़ गया. इस विशाल, बहुमंजिले सेंटर में खाने पीने की ढेरों दुकानें हैं, बुकशॉप है, छात्रों के बैठ कर खाने के लिए ढेरों टेबल-कुर्सियां हैं, लात तान कर सोने के लिए सोफेनुमा आराम कुर्सियां हैं, बैंक है, ए.टी.एम. है, सिनेमा हॉल है, गेमिंग स्टेशन हैं, पूल टेबल हैं, निंटेंडो वी खेलने की सुविधा है,  डाक-डिब्बा है, जानकारी काउंटर है, मोबाईल की दुकान है, पढ़ने के लिए क्वाइट हॉल है, और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए बड़े हॉल तक हैं. मजाक की भाषा में कहूँ तो बस चिड़ियाघर नहीं है, रेलवे स्टेशन नहीं है, और हवाई अड्डा नहीं है, बाकी सब कुछ है. आम तौर पर सुबह के समय यह सेंटर औसत रूप से भरा होता है. सर्वाधिक चहल-पहल और शोर-शराबा भोजन के समय हुआ करता है. आज की बात कुछ और ही लग रही थी और सुबह के ९:३० बजे भी खासी भीड़ थी.

                  यूनिवर्सिटी सेंटर: बाहर से                                                                                      यूनिवर्सिटी सेंटर: अंदर से


मैं ने कॉफी ली और किसी तरह एक टेबल पर कब्ज़ा जमाया. कॉफी की शुरुआती चुस्कियों के दौरान ही मैं ने उसे देख लिया. दायीं ओर,  सामने की ही दीवार से लगी टेबल पर वह अकेली बैठी थी. शांत-सौम्य चेहरा, ढलती सी उम्र, एक स्मित मुस्कान ओढ़े वह एक स्वेटर सा कुछ बुनती बैठी थी. बुनाई स्वचालित सी थी, क्योंकि उसकी आँखें बुनाई पर केन्द्रित नहीं थीं, और उसकी मुस्कान आस-पास की दुनिया को समर्पित सी लगती थी. शायद यूँ मेरा या किसी का भी ध्यान उसकी ओर न जाता, पर उसकी टेबल पर एक छोटा सा बोर्ड दीवार के साथ टिका था. बोर्ड पर फेल्ट पेन से हाथ की लिखाई में पढ़ा जा सकता था - "A MOM PRAYS FOR YOU". 

कुछ पल तो मेरी समझ में नहीं आया कि उसके बोर्ड पर लिखी इस इबारत और उसकी मुस्कान का मतलब क्या था? फिर अचानक दिमाग में कुछ चमका. भारत में मैंने तरह तरह के भिखारी देखे हैं. दयनीय चेहरे के साथ बूढ़े भिखारी, अंगभंग हुए भिखारी, 'दर्शन दो घनश्याम' गाते हुए भिखारी, ट्रेनों में नाचने-गाने वाले बच्चे, बच्चा गोद में लिए हुए कोई महिला या कोई ज़रा बड़ा बच्चा, मंदिरों के बाहर के भिखारी, रोज दरवाजे पर आने वाले, ताली बजा कर और मुझ जैसे ज़ीरो-पैक, बाकायदा शर्टधारी इंसान को भी 'हाय मेरे सलमान खान' बोल कर भीख माँगने वाले, शनिवार को शनि उतारने वाले, एकादशी और द्वादशी की याद दिलाने वाले, और भी न जाने कितने! इसके अलावा कमल हासन की 'पुष्पक' में भिखारी के रोल में नारायण को देखा है जो कमल के अठन्नी दिखा कर चिढ़ाने पर उसे एक एक कर ढेरों सिक्के और फिर सारे नोट यूँ दिखाता है कि हीनभावना के चलते गरीब और बेरोजगार कमल को ही रफूचक्कर होना पड़ता है. फिर गर्दिश का अन्नू कपूर याद आता है जो समय के साथ भिखारी के स्तर से ऊपर उठ कर खुद भिखारियों को चलाने वाली कंपनी का डायरेक्टर बन जाता है.  

इसके अलावा मैंने सुना है मोबाइल पर एक दूसरे को लंगर की सूचना दे कर बुलवाते भिखारियों के बारे में, करोड़पति भिखारियों के बारे में, मोटर साइकिल पर अपने भिक्षा क्षेत्र पहुँचने वाले भिखारियों के बारे में, बड़े शहरों में दिन में किसी दफ्तर में काम के बाद भीड़ वाली जगहों पर कपड़े बदल कर पार्ट-टाईम भीख माँगने वाले भिखारियों के बारे में, मौके के हिसाब से चोरी- राहजनी कर सकने या भीख माँग सकने वाले भिखारियों के बारे में, अपने छुट्टी के समय पर दूसरों को अपना भिक्षण-क्षेत्र लीज़ पर दे के जाने वाले भिखारियों के बारे में, सीज़न या सप्ताह के दिनों के हिसाब से अलग अलग धर्मों के धार्मिक संस्थानों के बाहर प्रकट होने वाले भिखारियों के बारे में,  सिग्नलों के बीच के क्षेत्रों का अतिक्रमण करने वाले भिखारियों से लड़ते मौलिक  भिखारियों के बारे में, गोद के बच्चों को किराए पर ले या दे  कर अलग अलग समय पर अलग अलग क्षेत्रों को कवर करने वाले भिखारियों के बारे में!
 
सबसे अनूठे या अलग मैंने अपने आज तक के जीवन में तीन भिखारी देखे हैं.  एक थे एक वयोवृद्ध, कृशकाय, बिना-दाँतों वाले पंडितजी जो भगवा कपड़ों और साफे में, त्योहारों के दिनों  पर ही मोहल्ले में हमारे घर आया करते थे और सांकल बजा कर घर की देहरी पर बैठ जाया करते थे. वे सिर्फ एक आवाज दिया करते, "माँ", और इसके सिवा कुछ नहीं बोलते थे. इसकी आवश्यकता भी नहीं हुआ करती थी. तब मेरी दिवंगत दादीजी जीवित थीं और वे उन्हें देखते ही माताजी को इशारा कर देतीं. इसके बाद थोड़ी थोड़ी मात्रा में विभिन्न प्रकार के अन्न, दालें, तिल, मसाले, नमक और तेल तक उनके लिए निकाला जाता जिसे वे आराम से और बड़ी सफाई के साथ साथ लाए हुए एक भगवा कपड़े में बनी हुई ढेर सारी अलग अलग पोटलियों में बाँधा करते. तेल के लिए उनके पास एक अलग डब्बा हुआ करता. मैं और मेरा भाई बड़े ध्यानपूर्वक उनके द्वारा सारे सामान को पूरे मनोयोग के साथ बाँधने की प्रक्रिया को देखा करते थे. अजीब सा स्नेह था उनके साथ. कारण शायद उनकी उम्र थी और गांधीजी वाला गोल फ्रेम का उनका चश्मा. तब बचपन था और हम लोग गांधीजी को भगवान सदृश माना करते थे. बाद में समय और बढ़ती महंगाई के चलते हमारे परिवार के लिए उन्हें सारे अन्नादि देना मुश्किल होता गया और उन्हें चीज़ें मांगनी पड़तीं. बन पाता तो हम लोग दे देते पर कभी कभी उन्हें किसी किसी वस्तु के लिए मना  भी करना पड़ता. 

तो ये थे पहले महोदय. दूसरा था जो कि गूंगा था और अजीब, दयनीय सी पर जोरदार आवाज में कुछ याचना सी करता. उसकी आवाज से मेरा छोटा भाई बहुत डरा करता और दौड़ कर पहले दरवाजा बंद करवाता था क्योंकि वह तब खुद ऐसा नहीं कर पाता था. पर यह बात भी थी कि वह उस गूंगे को कुछ न कुछ जरूर दिलवाया करता, बस शर्त यह होती कि दरवाजा थोडा सा ही खोला जाए और जब दरवाजा खुले तो वह किसी की गोद में सुरक्षित हो. मैंने शायद अब तक के जीवन में अपने भाई को उस गूंगे भिखारी से ही डरते देखा है. यहाँ तक कि जरूरत पड़ने पर माँ भी उसे डराने के लिए उसी भिखारी की ही याद दिलाती थी. 

तीसरा ऐसा अनूठा भिखारी मुझे याद आता है  जो  रविवार के रविवार आ कर दरवाजे पर बड़ी दबंग (फुल वॉल्यूम) आवाज में ऐलान करता था - "आज संडे है". उसे हम लोगों ने नाम दिया था 'संडे के संडे'. उसके इन तीन शब्दों का मतलब निकलता था कि मैं आ गया हूँ, अब मेरी साप्ताहिक भीख लाओ.
 
अमरीका का चलन और है. यहाँ के भिखारी आपसे सीधे कुछ बोल कर भीख नहीं माँगते. आप देखेंगे कि फुटपाथ पर वाद्य यन्त्र लेकर कोई अकेला मानुस या यंत्रों के साथ कुछ लोग संगीत की धुन निकालने में लगे होंगे, या फुटपाथ पर ही कोई चित्रकारी या रंगोली सी बना कर किनारे बैठे होंगे, या खुद को किसी कार्टून पात्र या विख्यात कलाकार के रूप में सजा कर मजमा लगा रहे होंगे, या बस ऐसे ही दीवार से लग कर फुटपाथ पर बैठे या सिग्नलों पर धूप में खड़े होंगे. बहुधा इन अंतिम दो प्रकार के भिखारियों के पास एक बोर्ड होता है जिसमें "होमलैस एंड ब्रोक" या "जॉबलैस एंड हंगरी, प्लीज़ हेल्प" जैसा कुछ लिखा होता है. ये आपसे बहुधा तो कुछ नहीं कहते, बहुत ज्यादा हुआ तो एक मुस्कराहट के साथ "हैलो" या "हाय" या समय के हिसाब से अभिवादन कर देंगे. 
 
मेरे साथ भारत में भी यही होता था और यहाँ भी वही हाल है. मैं किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता हूँ कि इनकी मदद कैसे करूँ - भीख देकर या भीख न देकर? यहाँ अमरीका में एक दुविधा और जुड़ जाती है - कि इन्हें एक रुपया दूँ या जब अपने देस जाऊँगा तो इन जैसे पचास को एक-एक रुपया दे  दूँगा? आपके पास इन दुविधाओं का कोई जवाब हो तो जरूर सुझाएँ.

मूल विषय से भटकने और आपको अपने साथ भटकाने के लिए माफ़ी चाहता हूँ. बात उन अमरीकी महोदया की हो रही थी जो एक बोर्ड के साथ सतत मुस्कुराती हुई मेरे सामने की टेबल में विराजमान थीं. एक-दो बार मेरी उनकी आँखें मिलीं भी पर मैंने अपने चेहरे पर न मुस्कान आने दी या और न कोई भाव क्योंकि मेरे मन में तब तक यह आ चुका था कि इन भिखारियों की हिम्मत तो देखो, यूनिवर्सिटी के अंदर तक आ धमके!  ये महोदया भी अपने माँ होने की दुहाई देती, और कोई नहीं मिला तो  छात्रों से ही माँगने आ पहुंचीं यहाँ! मन हो रहा था कि जा कर इसकी किसी से रिपोर्ट की जाए. फिर यह लगा कि मुझे क्या, बैठी रहने दो, और कोई कर ही देगा रिपोर्ट, मैं क्यों बेकार का झंझट पालूँ.
 
मैंने कॉफी खत्म की और सेंटर से बाहर निकल आया. लैब की ओर बढते हुए भी उस की मुस्कान और यह वाकया मन से नहीं निकल रहा था. कहीं कुछ खटक रहा था. फिर लगा कि क्या यार, कैसा आदमी हूँ मैं? क्या जाने भूखी हो. मैं उसके सामने बैठ कर शान से कॉफी पी आया. उससे भी कम से कम कॉफी के लिए पूछ लेता!  हूँ तो गरीब छात्र ही सही, पर इतना तो अफोर्ड कर ही सकता हूँ. दिल ने कहा, "पलट और वापस जा. उससे कॉफी या नाश्ते के लिए पूछ तो सही. और कुछ बोले तो खिला पिला दे. पांच-दस डॉलर मांगे तो दे दे. कम से कम इस एक बार इस एक की मदद तो कर दे!"
 
मन पक्का कर मैं वापस लौटा. सीधे उसकी टेबल की ओर जाते नहीं बन रहा था क्योंकि अभी अभी उठ कर यहाँ से गया था, सो आस-पास खड़ा होकर उसकी दिशा में यों देखने लगा जैसे किसी को ढूँढ सा रहा हूँ. फिर उसकी ओर देखा, हिम्मत का अगला गियर लगाया  और उसकी ओर बढ़ चला. पास पहुँचते हुए उसका अभिवादन किया और सामने पहुँच कर पूछ लिया, "माफ कीजिये, कुछ देर से आपका यह बोर्ड देख रहा था पर इसका कुछ भी मतलब समझ नहीं पा रहा था. रहा नहीं गया तो पूछने चला आया. क्या आप इसका मतलब समझा सकती हैं?"
 
उसका उत्तर था, "ओह, दरअसल आज से इस क्वार्टर की परीक्षाएं शुरू हो रही हैं. मैं परीक्षा देने वाले छात्रों के लिए प्रार्थना कर रही हूँ."
मुझे यह उत्तर सुनकर कुछ अजीब सा लगा और मैंने पूछा, "पर आप ऐसा किस वजह से कर रही हैं?"
उसने उत्तर दिया,"मेरे दो बेटों ने हाल ही में इस यूनिवर्सिटी से स्नातक शिक्षा प्राप्त की है. मेरा छोटा बेटा बस तीन महीने पहले ही यहाँ से स्नातक हो कर नौकरी करने चला गया है. मैंने परीक्षा के दिनों में मेरे बेटों और उनके मित्रों को बड़े तनाव में देखा है. अब मेरे बेटे और उनके मित्र तो इस यूनिवर्सिटी में नहीं हैं, पर मैं अपने उन बेटों-बेटियों, उन छात्रों के लिए यहाँ बैठी हूँ जो आज से परीक्षा देने वाले हैं. मैं उन्हें बताना चाहती हूँ कि तनाव के इस क्षण में मैं उनके साथ हूँ और उनकी सफलता के लिए प्रार्थना कर रही हूँ. आगे की परीक्षाओं के लिए भी आती रहूंगी, यदि ईश्वर ने चाहा और यदि मैं इसी शहर में रही तो."
 
मेरे ऊपर जैसे घडों पानी पड़ गया. इतनी शर्मिंदगी महसूस हुई कि बता नहीं सकता. वह किस भावना के साथ वहाँ बैठी थी,  और मैं उसे क्या समझे हुए था! अचानक मेरे मन में उसके लिए बहुत सा आदर उपजा और अपनी क्षुद्र सोच पर नाराजगी. मन ही मन भगवान को ढेर सारा धन्यवाद दिया कि अति-उत्साह में आकर उसकी रिपोर्ट करने की बेवकूफी से उन्होंने मुझे बचा लिया.
 
फिर उसने मुझसे पूछा, "आप यहाँ के छात्र हैं?"
मैंने कहा, "छात्र भी हूँ और शिक्षक भी. पी.एच.डी. का छात्र हूँ और स्नातक स्तर से नीचे के छात्रों को पढाता हूँ. आपकी इस भावना से विव्हल हूँ और अपने देश में कहीं भी मैंने ऐसा कुछ कभी नहीं देखा."
उसने कहा, " मैं आपके लिए भी प्रार्थना करूंगी और आपके छात्रों के लिए भी."
मैंने कहा, "जरूर, मुझे और मेरे छात्रों को इसकी आवश्यकता है और इसके लिए हम आपके आभारी रहेंगे. शायद आप बहुत देर से बैठी हैं, क्या मैं आपके लिए कॉफी या और कुछ ला सकता हूँ?"
उस ने मुस्कुरा कर कहा, "यह आपकी दयालुता है पर धन्यवाद, मुझे कुछ नहीं चाहिए."
मैंने उससे कहा, "आज आपने मुझे जो अभूतपूर्व अनुभव दिया है वह मैं जीवन भर नहीं भूलने वाला हूँ. इसके लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद."
उत्तर में उसने चिर-मुस्कान वाले चेहरे के साथ मुझसे कहा, "भगवान आपका भला करें."
 
अबकी बार वहाँ से लौटा तो ह्रदय पर उसकी मुस्कान की छाप लिए. मुझे मेरे स्वयं के स्कूल के कुछ अंतिम वर्ष याद आ गए जिसमें वार्षिक परीक्षा के समय मैं चाहा करता कि थोड़ी देर को भी माँ घर से कहीं न जाएँ. उनके घर में होने से एक अजीब सी सुरक्षा की भावना मिलती थी और पढ़ाई अधिक अच्छी तरह होती थी. बाद में घर छूटा, पढाई के लिए दूसरे शहर जाना पड़ा और हॉस्टल में रहना पड़ा. तब से किसी भी परीक्षा के समय माँ साथ नहीं रही - स्नातक होने के वर्षों में, मेरी दोनों स्नातकोत्तर परीक्षाओं में,  अधिकाँश प्रतियोगी परीक्षाओं में और अब यहाँ अमरीका की परीक्षाओं तक में, मुझे परीक्षा के समय माँ की अनुपस्थिति हमेशा ही बहुत खलती रही.  पर किस्मत का भी क्या खेल है कि आज एक माँ यहाँ परदेस में यूँ ही मिल गई.
 
जगजीत सिंह जी की गाई एक गज़ल का एक शेर बरबस याद हो आया.
"मैं रोया परदेस में, भीगा माँ का प्यार
दिल ने दिल से बात की, बिन चिट्ठी बिन तार....."

Saturday, September 18, 2010

क्या विदेशों से भारत लौटते गुरुजन स्वदेश में टिक पाएंगे?

पिछले दिनों खबर पढ़ने को मिली कि 'देश के शीर्ष तकनीकी शिक्षा संस्थानों में शिक्षकों की कमी को पूरा करने का रास्ता सहज हो गया है. पीएचडी करके विदेश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में पढ़ा रहे शिक्षक बड़ी संख्या में भारत लौट रहे हैं. अकेले आई.आई.टी. कानपुर से ही ऐसे लगभग तीन दर्जन शिक्षक जुड़े हैं.' (पूरी खबर यहाँ पढ़ें)


बात पर गौर किया जाए तो वास्तव में गुरुजन लौटे नहीं हैं क्योंकि उपरोक्त नियुक्तियों में से अधिकाँश संविदा के आधार पर होंगी. वैसे भी आई.आई.टी. में अभी इन नियुक्तियों को पूर्णकालिक करने के विषय में अभी विचार होना शेष है. आप्रवासी भारतीय शिक्षकों द्वारा इन अल्पकालिक नियुक्तियों को स्वीकार किये जाने पर अभी से अधिक प्रसन्न होना अपरिपक्वता होगी. ऐसी बात कदापि नहीं है कि केवल अग्रिम वेतनवृद्धि देख कर और देशप्रेम के कारण ये गुरुजन वापस लौटे होंगे. वे भी अभी अपने नए नियोक्ताओं, अपने कार्य-वातावरण और भारत में उनके व उनके परिवार के रहन-सहन पर विचार और चिंतन अवश्य करेंगे.  पहली बात तो यह है कि जीवन की जो गुणवत्ता और स्तर इन शिक्षकों का विदेशों में था वह इन्हें भारत में नहीं मिलने वाला है क्योंकि दैनंदिन सुविधाओं के मामले में अभी भी हमारे देश को बहुत आगे जाना है.


इस सब के साथ ही एक महवपूर्ण तथ्य यह है कि विदेशों में उद्योग और शैक्षणिक संस्थान एक दूसरे के साथ कंधे से कंधा मिला कर कार्य करते हैं. उद्योग-जगत अपनी आवश्यकताओं और समस्याओं के विषय में शैक्षणिक संस्थानों से सतत विचार-विमर्श करता रहता है और इस विषय में समाधान खोजने के लिए आवश्यक शोध के लिए संस्थानों को अपार धनराशि उपलब्ध करवाता रहता है. संस्थान भी इस धनराशि का उपयोग छात्रों को शोध में लगाए रखने के लिए करते हैं. आई.आई.टी. और कुछ विशिष्ट एन.आई.टी जैसे संस्थानों को छोड़ दें, तो शोध का ऐसा माहौल भारत में बहुत कम अन्य स्थानों पर देखने को मिलता है. शोध के स्तर और व्यापकता के मामले में भारत अभी पश्चिमी देशों की तुलना में कोसों पीछे है. यहाँ तक कहा जा सकता है कि भारत में आपको शोध कम, शोध का मजाक और मखौल अधिक देखने को मिलेगा. यही कारण है कि अंतर्राष्ट्रीय प्रकाशनों में भारतीय शोध को विरले ही कभी प्रकाशित होने का अवसर मिलता है. दूसरी ओर, विदेशों में अध्ययन कर रहे भारतीय छात्र या अध्यापन कर रहे भारतीय मूल के शिक्षक इसी शोध की दुनिया में जीते हैं और शोध-जगत को अपना सार्थक और सतत योगदान देते रहते हैं. यह जगत जब उन्हें भारत में प्रायः दुर्दशा की स्थिति में मिलेगा,  तो क्या उत्साह को पोषित रखते हुए वे एक नए शोध अभिविन्यस्त वातावरण की उत्पत्ति करने को तत्पर होंगे? या फिर भ्रम-निवृत्ति होने के पश्चात फिर से उन्हीं पश्चिमी देशों को लौट जायेंगे, जहाँ से वे आये थे?


इसके अलावा भारत में रहने के दौरान इन आप्रवासियों का जब हर स्तर पर चाय-पानी और जेब गरम करने के सत्य से सामना होगा, तब देखना होगा कि वे इसे कैसे लेंगे. विदेशों में कैसा भी कार्य करने वाले किसी भी मनुष्य की पगार इतनी तो होती ही है कि वह बहुत आराम से, सपरिवार, सर्वसुविधायुक्त जीवन जी सकता है. यह सबसे बड़ा कारण है कि विदेशों में लोग अपना कार्य ईमानदारी से करते हैं और कम से कम छोटे और रोजमर्रा के मामलों में भ्रष्टाचार देखने में नहीं आता.


इसके विपरीत, हमारे देश में आप किसी भी विश्वविद्यालय, शिक्षण संस्थान या सर्वोच्च संस्थाओं को भर्राशाही, लाल-फीताशाही, राजनीति और भ्रष्टाचार में लिप्त न पायें, तो आश्चर्य होगा. ऐसे तंत्र में वे लोग कैसे फिट होंगे जिन्हें न तो इस सबकी आदत है,  न वे इसके लिए तैयार हैं? जब छोटे छोटे कार्यों के लिए इन्हें अपने कार्य-क्षेत्र और दैनंदिन जीवन में बाबुओं के चक्कर लगाने पड़ेंगे, तब उनका कितना देशप्रेम और देशसेवा का प्रण बचेगा, यह देखने की बात होगी. उन गुरुजनों के अलावा उनके परिवार के अन्य सदस्यों को भी इस सब से दो-चार होना ही पड़ेगा. वे जिस देश से भारत आयेंगे,  सफाई और प्रदूषण-स्तर के मामले में भी वह देश हमारे देश से कहीं बेहतर ही होगा. कुल मिला कर बात यह है कि इन परिस्थितियों में भी टिक कर लंबी पारी खेलने वाले गुरुजनों की संख्या बहुत अधिक नहीं होगी, ऐसा मेरा अंदेशा है.


वर्चुअल क्लास या ई-लर्निंग अवश्य शिक्षकों की कमी दूर करने की दिशा में एक समाधान हो सकता है, पर इस में वह बात आ पायेगी जो कि एक प्रत्यक्ष शिक्षक की कक्षा में आ पाती है, ऐसा मुझे नहीं लगता. यह केवल एक कमजोर विकल्प ही हो सकता है, उस से अधिक कुछ नहीं.


वास्तव में आवश्यकता है अपने ही देश में शिक्षण को आकर्षक और लाभप्रद व्यवसाय बनाने की. पिछले बहुत से वर्षों से शिक्षण को अधिकाँश शिक्षकों ने या तो तदर्थ व्यवसाय के रूप में लिया है, (जिससे बचने वाले समय का सदुपयोग वे दूसरी प्रतिस्प्रधात्मक परीक्षाओं की तैयारी के लिए करते हैं), अथवा विकल्पहीनता की स्थिति में उसे मन मार कर अपनाया है. मैं स्वयं १००० से अधिक छात्रों को इंजीनियर बना चुका हूँ, पर उनमें से मैं ऐसे दस भी नहीं निकाल सका, जिनका ध्येय सदा से अध्यापन रहा हो. मेरे अच्छे से अच्छे या साधारण छात्रों में से भी कोई नहीं निकलता था जो अध्यापन को ह्रदय से अपनी जीवन-वृत्ति बनाना चाहता था. अच्छे और बुद्धिमान छात्रों को शिक्षण जगत अपनी ओर आकर्षित न कर सका, और औसत और साधारण लोग इस व्यवसाय में भरते चले गए. यह भी एक कारण है कि शिक्षण जगत बहुत से ऐसे शिक्षकों से भरा पड़ा है जो सुरक्षित नौकरी और अपने आरामतलब रवैये के चलते कूप-मंडूक हो कर रह गए. इन शिक्षकों ने कभी भी अपने ज्ञान को बढ़ाते हुए, बदलते हुए समय और तकनीकों के साथ बदलती हुई तकनीकी शिक्षण की आवश्यकताओं के अनुरूप स्वयं को अद्यतन रखने का प्रयास नहीं किया. फलस्वरूप ऐसे बहुत से शिक्षक न केवल अप्रासंगिक हो कर रह गए हैं, अपितु यदा-कदा अपने छात्रों के परिहास का भी कारण बनते रहते हैं. ऐसे शिक्षक अपने छात्रों को कैसा और किस स्तर का ज्ञान दे पाते होंगे, यह अनुमान लगाना कठिन नहीं है. फिर, बहुत से शिक्षक ऐसे भी हैं, जो समय के साथ तंत्र की लाल-फीताशाही, भ्रष्टाचार और व्याप्त राजनीति आदि को देखते हुए कुंठित होते चले गए. कुंठित शिक्षकों से भी आप कैसी शिक्षा की अपेक्षा रखते हैं?  कुल मिलाकर यह समझना कठिन नहीं है कि शिक्षण जगत की सबसे बड़ी समस्याएँ क्या हैं.


अवसर की कमी या परिस्थितियों से समझौता कर के शिक्षण व्यवसाय में आने वाले मैं ने बहुत देखे हैं. फिर वे कभी बाहर न निकल पाए इसलिए इसी क्षेत्र में रह गए. मैं अपने बुद्धिमान छात्रों को यह व्यवसाय न चुनने के लिए गलत भी नहीं ठहरा सकता हूँ. भारत में २० वर्षों तक अध्यापन करने के बाद भी एक औसत इंजीनियरिंग शिक्षक जितना धन जायज तरीकों से बना पाता है, उससे दो गुना या अधिक धन उसके द्वारा पढ़ा कर ताजा निकाला छात्र अपनी नौकरी के दूसरे वर्ष में कमाने लगता है. क्या यह एक अति-विषम विसंगति नहीं है? मेरे विचार में तो है, और यदि भारत के शीर्षस्थ योजनाकारों और शासन ने इस समस्या को गंभीरता से ले कर सुलझाने के प्रयास तुरंत नहीं किये, तो आज जो शिक्षकों का अकाल स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर है, वह एक विकराल समस्या का रूप धारण करेगा.


तो, इस समस्या का समाधान क्या है? चाहे जो कहा जाए, धन से बड़ा व्यावसायिक उत्प्रेरक और कोई नहीं होता है. इसलिए, यदि हम चाहते हैं कि हमारे सबसे बुद्धिमान और होनहार छात्र शिक्षण की ओर आकर्षित हों और उसे व्यवसाय के रूप में ह्रदय से स्वीकार करने के विषय में सोचने को उद्यत हो, तो हमें इस व्यवसाय के साथ सम्माननीय स्तर के वेतन को जोड़ना होगा. यह सम्माननीय स्तर ऐसा होना चाहिए कि इसे प्राप्त करने के लिए सबसे अच्छे और बुद्धिमान छात्रों में प्रतिस्पर्धा रहे. शिक्षा और शोध के क्षेत्र से हमें भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, लाल-फीताशाही इत्यादि रोगों का निराकरण और समूल-नाश करना होगा. हमें वास्तविक और गुणवत्तापूर्ण शोध के वातावरण का निर्माण करना होगा, और शिक्षकों का समाज में खोया हुआ स्थान उन्हें वापस दिलाना होगा. इसके बिना शिक्षा जगत का कल्याण संभव नहीं है, ऐसा मेरा सोचना है.


(इस लेख को रायपुर, छत्तीसगढ़ से प्रकाशित होने वाले "आज की जनधारा" दैनिक ने अपने 15 सितम्बर 2010 के सम्पादकीय में स्थान दिया है.)

Friday, September 17, 2010

बच्चों की पिटाई करने पर अब शिक्षकों को मिलेगी सजा


हाल की एक खबर के अनुसार भारत की केंद्र सरकार ऩे स्कूलों में कारपोरल पनिशमेंट पर रोक लगाने के दिशा-निर्देश जारी किये हैं. इन निर्देशों के बाद अब शिक्षकों को संभल कर रहना होगा क्योंकि भविष्य में इसका उल्लंघन करने वाले शिक्षकों को अब जेल या जुरमाना, या दोनों की सजा हो सकती है. साथ ही दोषी शिक्षकों को पदोन्नति और आय-वृद्धि नहीं मिलेगी. खबर यह भी है कि भारत सरकार एक नया 'चिल्ड्रन ऑफेंसेज़ बिल' भी तैयार कर रही है. इस बिल के अनुसार बच्चों से मारपीट, उनका शारीरिक शोषण, और गाली-गलौच भी अपराध की श्रेणी में आयेंगे. यह बिल स्कूलों, शिक्षकों के साथ अभिभावकों, रिश्तेदारों और पड़ोसियों पर भी लागू होगा. हालांकि रैगिंग पहले ही अपराधों की श्रेणी में है, पर वह इस बिल की परिधि में भी आएगा.

इस बिल के विषय में बहुत से सवाल उठते हैं. क्या हमारे देश की जनता में इतना सामर्थ्य है कि ऐसे कानूनों को समझ भी सके? क्या इसके दुरुपयोगों से जनता डरेगी, इसे ऐसा स्वरूप दिया जाएगा? ऐसा बिल जारी करने से बच्चों के हाथों में बहुत सी शक्ति आ जायेगी. क्या वे उस शक्ति का सदुपयोग ही करेंगे? क्या उन्हें कोई बड़ा बरगला या डरा-धमका कर इस बात के लिए राजी नहीं कर सकता कि वे उसका दुरुपयोग करें? हमें 17वीं शताब्दी के अमरीका के सालेम में हुए उन मुकदमों को नहीं भूलना चाहिए जब अल्पवय बालिकाओं द्वारा मात्र आरोप लगा देने पर पचासों लोगों को जादू -टोना करने और चुड़ैल होने के लिए फांसी पर चढ़ा दिया गया था. बाद में इन में से बहुत सी बालिकाओं ने आरोपों को झूठा बताते हुए माफ़ी माँगी थी, पर तब तक बहुत से निर्दोष चर्च निर्देशित न्यायालय के आदेशों द्वारा मारे जा चुके थे.

मेरे एक मित्र की इस बिल पर मजेदार प्रतिक्रया थी कि इस कानून से शायद जनसंख्या कम हो जाए क्योंकि लोग डरने लगेंगे कि न जाने कब बच्चा घर वालों को जेल भिजवा दे. उनका विचार था कि ऐसा बिल भारत में लागू करना पश्चिमी देशों का अंधानुकरण है.

मेरे विचार में पश्चिमी क़ानून बनाने के बारे में उनका कथन बिलकुल सही है. अमरीका में बच्चों को सबसे पहले यह सिखाया जाता है कि, "बच्चों, तुमें कोई भी परेशान करे, यहाँ तक कि तुम्हारे अपने माता-पिता भी, तो सीधे ९११ डायल करो और उन्हें अंदर करवा दो." बच्चे इसका पूर्ण पालन करते हैं. ऐसे बहुत से माता पिता देखे जा सकते हैं जिनका जीवन उनके बच्चों के ९११ कॉल और उसके बाद की शिकायत के बाद दूभर हो गया. ऐसी पहली शिकायत के बाद अगले एक साल तक हर महीने माता-पिता को बच्चे के साथ न्यायालय जा कर हाजिरी देनी पड़ती है. वहाँ बच्चे से फिर से पूछा जाता है कि उसे माँ-बाप से कोई शिकायत तो नहीं है. यदि उसने कहा कि सब ठीक है, तब तो अगले महीने तक ठीक, पर यदि उसने फिर शिकायत कर दी, तो बच्चे को सरकार अपने संरक्षण में ले लेती है और फिर उसे उसके माता-पिता को नहीं देती. पहली शिकायत के बाद, अगले एक साल तक यदि बच्चे को किसी भी तरह की चोट पहुँची (चाहे खेलते हुए या उसकी अपनी गलती से), तो भी उसे माता-पिता की लापरवाही माना जाता है. यह सब बाकायदा माता-पिता के रिकार्ड में दर्ज हो जाता है और आगे की पूरी ज़िंदगी उनका पीछा नहीं छोड़ता है. मजे की बात यह, कि यह केवल अमरीकी नागरिकों पर ही लागू हो, ऐसा नहीं है. कुछ समय के लिए नौकरी के अनुबंध पर गए विदेशी भी इसकी परिधि में आते हैं.
 

अब यह बात तो है कि हम भारतीयों के अपने बच्चों को पालने के तौर-तरीके अमरीकियों के तरीकों से सर्वथा अलग होते हैं. भारत में हम सबसे पहले बच्चे को आदर-सम्मान, नम्रता, भद्रता, विनय, शालीनता और शिष्टाचार की शिक्षा देते हैं. इस आदर सम्मान में सर्वोपरि स्थान माता-पिता को दिया जाता है. अमरीका में ऐसा कोई चलन है ही नहीं, और हर कोई पृथकत्व और एकान्तता का समर्थक है, यहाँ तक बच्चे भी. जन्म के तुरंत बाद से ही माता अपने बच्चे को एक ऐसे पृथक पालने में सुलाने लगती है, जिसे अंगरेजी में क्रिब कहते हैं. भारत में तो पालन पोषण का ऐसा रिवाज नहीं है. अमरीका  में - अपने माता-पिता की एक न सुनने वाले, उनकी अवहेलना करने वाले, और सीधे सीधे उनके अपमान और उपहास में कुछ भी कह जाने वाले बच्चे ही मैं ने अधिक देखे हैं.  इस वजह से, और ऐसे कानूनों के कारण अमरीका में रहने वाले बहुत से भारतीयों को भी ढेर सारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है.
 

ऐसे क़ानून भी शायद एक कारण हैं कि अमरीकियों को अपने बच्चों के साथ उतना लगाव नहीं हो पाता जितना हम भारतीयों को अपने बच्चों से होता है. यह सब उनके सामजिक ढाँचे और सामान्य जीवन को भी प्रभावित करता है. देखना यह है कि क्या हम ऐसे कानून बना कर भारत में लागू कर पाएंगे? भारतीय परिप्रेक्ष्य में ऐसे कानूनों का औचित्य मुझे ज़रा कम ही समझ आता है. अगर इस कानून को बना कर तुरंत जनता पर लाद दिया गया, तो देखियेगा क्या क्या गुल खिलेंगे.

अब ऐसे बिल को स्वागत-योग्य कहा जाए या इसके दुरुपयोग से डरा जाए? जहाँ तक दुरूपयोग की बात है, तो कौन सा ऐसा बिल है जिसका दुरूपयोग न हुआ हो? हरिजन क़ानून और दहेज प्रताडना क़ानून हरिजनों और विवाहिताओं की सहायता के लिए बनाए गए थे. आज देखा यह जा रहा है कि ऐसे कानूनों का जमकर दुरुपयोग हो रहा है. इन कानूनों के प्रावधान भी अजीब हैं. आरोपी सच में दोषी है भी या नहीं, यह बाद में देखा जाता है, जब मुकदमा चलता है और फैसले तक पहुँचता है. रिपोर्ट होते ही पहला काम पुलिस यह करती है कि बिना कोई छानबीन किये आरोपी य आरोपियों को पकड़कर जेल में पहले ठूँसती है. इन कानूनों में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि शिकायत झूठी साबित होने पर शिकायतकर्ता को  भी कड़ी सजा का डर रहे. फिर, भारत में तो क़ानून से डरने का चलन ही नहीं है और लोग पैसों और ताकत के बल पर झूठ को भी सही साबित कर लेते हैं. ऐसे में इस नए क़ानून का क्या होगा? दुरुपयोग तो शायद हर क़ानून का हो सकता है, पर जब दुरुपयोग एक सीमा से अधिक होने लगे, तो क्या वह चिंताजनक नहीं होता? क़ानून बनानेवाले इस विषय में सोचते नहीं, क्योंकि उन्हें किसी क़ानून का कोई डर नहीं है. हो भी क्यों? "समरथ को नहिं दोस गुसाईं".

तो, जैसे अस्पृश्यता, हरिजन और दहेज सम्बंधित बिलों का धड़ल्ले से दुरुपयोग हुआ है, वैसे ही इस बिल का भी होगा. बिल के आने के बाद भी कितने शिक्षकों की मानसिकता बदलेगी, कहना कठिन है. अलबत्ता इतना जरूर होगा कि शिक्षक पढ़ाने से डरने जरूर लगेंगे. आजकल के अधिकाँश हाई-स्कूलों के छात्रों में अनुशासन की कमी वैसे भी बहुतायत में देखने को आती है. इसका सबसे बड़ा कारण शिक्षकों की उदासीनता है. इसे "मुझे क्या" सिंड्रोम कह सकते हैं. और वे उदासीन भी क्यों न हों? सारे सदाचरण का, मान-मर्यादा का, सारी नैतिकताओं के ठेके का बोझ तो भारत में शिक्षकों पर लादा जा सकता है. साथ ही उनसे जनगणना, मतगणना, पल्स-पोलियो इत्यादि से सम्बंधित (और शिक्षण से असंबंधित) सारे कार्य कराये जा सकते हैं, पर उन्हें आराम से जीने लायक जायज पैसा नहीं दिया जा सकता है. अधिकाँश शिक्षकों में छुपी कुंठा का सबसे बड़ा कारण यही है. ऐसे में क्या उम्मीद की जा सकती है? जब तक इन समस्याओं का जड़ से हल नहीं निकलेगा, ऐसे बिलों को अधिकतर शिक्षक सही परिप्रेक्ष्य में नहीं ले पाएंगे. ऐसा मुझे लगता है (एक शिक्षक होने के नाते).

रैगिंग लेना तो पहले से ही मानवाधिकार कानून के तहत अपराधों की श्रेणी में आ गया है (लगभग पांच साल पहले से). हर साल बहुत से (जैसे कि मेरे पूर्व-कालेज में) कालेजों में एंटी-रैगिंग स्क्वाड का गठन होता है और शिक्षकों को विभिन्न क्षेत्रों में (हॉस्टल, और कुछ क्षेत्र जहाँ छात्र किराये पर रहते हैं, रेलवे-स्टेशन, पार्क इत्यादि जैसे कुछ सार्वजनिक स्थानों में) औचक पहुँच कर जांच करने का आदेश होता है. कड़ी सजा का प्रावधान भी है, पुलिस रिकॉर्ड के साथ, पर फिर भी रैगिंग पर पूरी रोक तो नहीं लग पायी है.

Wednesday, September 15, 2010

बिदाई बुखार उर्फ़ फ़ेयरवैल फ़ीवर

एक दिन की है बात,
कुछ शिक्षक साथियों के साथ
हम लैब में थे मशगूल,
सारी दुनिया और कॉलेज को भूल
ध्यान केन्द्रित कर रखा था अचल
सैट कर रहे थे नये प्रैक्टिकल
कि अचानक भवन में हुआ
बड़े ज़ोर का शोर
हम निकले लैब से
और दौड़ पड़े शोर की ओर
लगा, फिर फट गया है
टायलेट में अगरबत्ती बम
फिर साबित करनी चाही है
किसी ने अपनी डेयरिंग और दम

एक छात्र हमें देखते ही
बस अबाऊट-टर्न हो गया
हमने सोचा
हम या तो हैं ही इतने डरावने
या जरूर इससे कोई जुर्म हो गया
जोर से बोले - रुक !!
--- वो रुक गया
पलटा, और, कोई चारा नहीं था,
इसलिये ज़रा झुक गया

हमने पूछा - "ये बम फटा है,
या किसी ने आग लगायी है ?
अभी-अभी कुछ छात्राएँ
बड़ी ज़ोर से चिल्लाई हैं
अब किसने फिर ये
नया पंगा लिया है ?
कहीं किसी ने मधुमक्खियों का
छत्ता तो नहीं छेड़ दिया है ?"
वह बोला - "सर, ऐसी कोई बात नहीं है
कोई आतंक नहीं है व्याप्त
बस इतनी सी बात है कि
फ़ाइनल इयर का सेशन हो गया है समाप्त
वैसे तो क्लास से भागने की
इनकी सदा की आदत रही है
पर अब और क्लास अटैण्ड करने की
ज़रूरत ही नहीं है
बस, उसी की खुशियाँ
मनाई जा रही हैं
और बिना कन्ट्रोल के
फोटुएँ खिंचाई जा रही हैं ।"
हमने पूछा - "अपनी कहो,
क्या क्लास से भाग रहे थे ?
नींद आ रही है ना ?
कल कितने बजे तक जाग रहे थे" ?

उसने ज्ञान दिया - "सर,
क्लास से भागने से
कहाँ मेरा कोई नाता है ?
क्लास से भागता तो वो है
जो क्लास के लिये जाता है"।

हमने पूछा - "हमें देख भागे क्यों ?
और ऐसा क्या है छुपाने को ?"

उसने कहा - "सर, कुछ खास नहीं,
नया एन-95 लाया था
जनता को दिखाने को ।"

हमने पूछा - "सिर्फ़ दिखाना है,
या रोल में आना है ?
फिर कुछ पर रौब जमाना है
और कुछ को रिझाना है ?"

उसने कहा - "सर,
आपसे क्या छुपाना है ?
आप उम्र में बड़े हैं
और यहीं से तो पढ़े हैं
आपने अपनी ज़िन्दगी में
ये सब नहीं किया
तो क्या हम भी न करें ?
डरते होंगे हमारे दुश्मन
हम भला आपसे क्यों डरें ?
बस, ज़रा कॉरिडोर से
यूँ ही गुज़र रहे थे
आपकी कसम, पप्पा से एक
जरूरी बात कर रहे थे ।"

हम कर गये ऐसे ही हजम
उसकी वो झूठी कसम
कुछ नहीं कहा,
बस रह गये मौन
समझ गये थे कि
असल में पप्पा हैं कौन ?

कि फिर से चिंघाड़ सुनाई दी
और कुछ लोगों ने लगाया एक नारा
पहली मंज़िल से नीचे झाँका हमने
तो पाया एक अजब सा नज़ारा
दर्जनों फ़ोटोग्राफ़र
नीचे अपने कैमरे आजमा रहे थे
कितने ही तरीकों से
अपनी प्रतिभा दिखा रहे थे
मानो कैमरे नहीं,
मशीनगन चला रहे थे
और फ़ोटो खिंचवाने वाले
कैसी-कैसी
भाव-भंगिमाएँ दिखा रहे थे
हमने सोचा - ऐसी अदाकारी
हमने पहले कहाँ देखी होगी ?
ऐसे चेहरे तो बनाते हैं -
विदूषक, जोकर या मानसिक रोगी ।

तभी एक हरी-वर्दी वाला गार्ड
बड़े वेग से भागता हुआ आया
हाँफ़ते हुए उसने हमें
शोले की बसन्ती वाले अंदाज़ में बताया -
"वो छत पर देखिये सर
लड़कियाँ कहाँ बढ़ गयी हैं
पानी की टंकी और ऐन्टीने
तक पर चढ़ गयी हैं
लगता है
आज कोई आफ़त जरूर आयेगी
जरूर कहीं
कोई गिर-गिरा जायेगी
और
हमारी नौकरी पर बन आयेगी
फिर सिर पर
तलवार तन जायेगी
सब नीचे उतर आयेंगी माई-बाप
अगर ज़ोर से चिल्ला देंगे आप" ।

हमने सोचा - नीचे आयेंगी या न आयेंगी
अगर हम चिल्लाये या छत पर पहुंचे
तो मारे डर के
दो-चार नीचे ज़रूर टपक जायेंगी

हमने शोले के जय के अंदाज़ में
गार्ड से कहा -
"हाँ, देखा - कुछ नहीं होगा
जब जोश उतरेगा,
तो वीरू की तरह ये भी उतर आयेंगी"।
मन में कहा - "गार्ड, मेरे भाई,
तुम्हें बड़ा मुगालता है
मेरे पास इन्हें उतारने के लिये
कोई जादू-मन्तर नहीं है
तुम बावर्दी हो, मैं बे-वर्दी
बाकी इनके लिये
मुझमें-तुममें कोई अन्तर नहीं है"।

ब्लॉक में रहना तो मुश्किल था
इसलिये हमने ब्लॉक छोड़ दिया
और कॉफ़ी-कॉर्नर उर्फ़ सी.सी.
की ओर मुख मोड़ लिया
पर इस ओर भी
कहाँ कोई शान्त ठिकाना था
मानो, सब को आज ही
फ़ोटो खिंचवाना था
ढेरों स्टूडियो से
बन गये थे चहुँ ओर
सुनामी की तरह का
उठ रहा था शोर
सारा कैम्पस हल्ले से
हो चुका था आक्रान्त
डर के मारे सहम
मधुमक्खियाँ तक हो गयीं थीं शान्त
हम ने सोचा -
ये वीर-वीराँगनाएँ अगर
अठारहवीं शताब्दी में पैदा होते
तो अंग्रेज़ इनका शोर सुनकर
वैसे ही भारत से भाग खड़े होते

अचानक नज़र आये, पेड़ों और
हॉस्टल की छत पर अनेक साये
हमने आस-पास वालों से कहा -
"अरे ! भगाओ !!
कैम्पस में फिर आज बन्दर घुस आये" !
कोई बोला - "नहीं सर,
वहाँ नहीं है कोई बन्दर
ये तो हैं हमारे प्यारे सीनियर
आज से फ़ेयरवैल तक के सिकन्दर" !

सी.सी. में राजू बोला -
"सर, इस महीने तो हमारी बन आई है
पार्टियों से हुई इस बार अच्छी कमाई है
कितना अच्छा होता
कि हमेशा ऐसे ही कमाते
क्यों नहीं आप लोग
हर महीने फ़ेयरवैल मनाते ?
'वृन्दावन' से 'हरि-राज' तक,
'मधुरम' से 'शिवनाथ' तक, सभी कमा रहे हैं
अपने स्टूडेण्ट हर जगह,
डेली पार्टियाँ जमा रहे हैं
गिने चुने दिन रह गये
पैसों का अब क्या मोल
फ़ुल चल रहे हैं सब -
क्या 'ऑर्किड', क्या 'रश-एण्ड-रोल'
कहीं बिलासपुर बैच,
तो कहीं बिहार बैच की महफ़िल जमेगी
सन्डे शाम का होटल डिनर भूल जाइये
कहीं जगह नहीं मिलेगी" ।

ओवरब्रिज के नीचे से गुजरे
तो रुक गये कुछ ठिठक के
ऊपर हमारे कुछ छात्र-छात्राएँ दिखे
जो वहाँ थे मुण्डेर से लटक के
हमने चिल्ला कर पूछा -
"अपने बनानेवाले से मिलने की
जल्दी क्यों मच रही है" ?
ऊपर से कोई चिल्लाया - "सर !
बीच से हट जाइये…
हमारी फ़ोटो खिंच रही है
आज तो लड़कियों ने भी
रख दिया है सब को हिला कर
बराबरी साबित कर दी है
कंधे से कंधा मिला कर
इन सब ने भी आज टपरे पर
फ़ोटो खिंचवाई है
और ओवरब्रिज क्या,
आमिर खान की तरह
रेल्वे ट्रैक पर दौड़ लगाई है
फिर न कहियेगा
इन में से कोई भी बेचारी है
ओवरब्रिज के बाद
माइक्रोवेव टावर की बारी है
आज तो हम
किसी जगह को नहीं छोड़ेंगे
जिसने रोका उसके सर पर
बम फोड़ेंगे" ।
हमने सोचा - आज तो
भिलाई-दुर्ग वालों की नहीं है खैर
जिसने इन्हें टोका
उसी से हो जायेगा इनका बैर ।

चौक पर पहुँचे,
तो पाया, बदला हुआ है नक्शा
रिक्शेवाले तो सारे खड़े थे
पर नहीं था एक भी रिक्शा
हमने एक से पूछा -
"क्या भाई देवदास ?
क्या आज बात है कोई खास ?
हड़ताल है, या
और ही कोई माजरा है ?
आज तुममें से कोई भी
रिक्शा नहीं चला रहा है "!!
वो खुशी से बोला - "हम सभी
आज बड़े प्रसन्न भये हैं
आपके छात्र सारे रिक्शे
फ़ोटोग्राफ़ी हेतु किराये पर ले गये हैं"।

आगे पहुँचे, तो कुछ
नया देखा बाजार में
बहुत सारे लोग खड़े थे
एक लम्बी कतार में
हमने पूछा - "क्या राशन, गैस,
या पैट्रोल के लिये लाइन लगा रहे हैं ?
या बारी-बारी से हनुमानजी को
दूध पिला रहे हैं ?
ऐसा कुछ हो तो हम भी
लाइन में लग जायें
कृपा कर के हमें
इसका कारण तो बताएँ
आखिर किस बात की है ये लाइन"?
उत्तर मिला - "सर !
आज का दिन है बड़ा फ़ाइन !!
आज कुछ कर दिखाना है
शाम को
फ़ेयरवैल पार्टी में जाना है
बड़ा कीमती आज का टाइम है
राशन, गैस, पैट्रोल नहीं
सामने बोर्ड देखिये
ये ब्यूटी-पार्लर की लाइन है "।
हमने जो ऊपर उठाई नज़र
तो पढ़ा
"वीनस कम्प्यूटराइज़्ड ब्यूटी-पार्लर"
सोचा, विज्ञान से दुनिया भी है
कमाल की बन आई
शायद रोबोट करते होंगे
यहाँ रँगाई और पुताई।

दर्जी से पूछा -
"सूट सिल गया हो तो ले जायें" ?
उसने कहा - "सॉरी सर !
आप अगले हफ़्ते आयें
समझ नहीं आ रहा कि जियें या मरें
फ़ैयरवैल के इतने ऑर्डर हैं
कैसे पूरे करें ?
माफ़ कीजियेगा,
सूट तो तैयार था, पर
एक प्रॉब्लम मोल ले लिया है
आपका तैयार सूट,
आपके स्टूडेण्ट को
किराये पर दे दिया है" ।
हमने कहा - "नालायक !!!
अब हम क्या करेंगे ?
पार्टी में अब
हम अपने ऊपर क्या धरेंगे" ?
उसने कहा - "अपना कान
ज़रा इधर लाइये
और बिलकुल मुफ़्त
एक बढ़िया सलाह पाइये
वहाँ कोने में धोबी की दुकान है
बस वहाँ पहुँच जाइये फ़टाफ़ट
और किराये पर कोई कुर्ता-पायजामा
ले कर निकल जाइये सरपट
सोच क्या रहे हैं,
कुर्ता भी खूब फ़बेगा
देर करेंगे, तो धोबी के पास
कुर्ता भी न बचेगा" ।

अपना रोल हमें आखिर
निभाना ही था
शाम को फ़ैयरवैल पार्टी में
जाना ही था
सोच रहे थे,
आज हो जायेगी देर रात
तभी हुई अचानक
सवालों की बरसात
"कहाँ जा रहे हो ?
कितने बजे आओगे ?
क्या आज भी घर पर
खाना नहीं खाओगे ?
ये सारे फ़ंक्शन
क्या तुम ही कराते हो ?
लगातार कितनी रातों को
बड़ी देर से आते हो !!
कहे देती हूँ,
आज लेट मत होना
वरना दरवाजा नहीं खुलेगा
बाहर ही सोना" ।

हमने कैम्पस के अंदर
जैसे ही मोड़ी कार
लगा जैसे हो
कोई नया ही संसार
बड़ी भीड़ थी,
बहुत से लोग
सजे-धजे खड़े थे
बैण्ड की धुन पर लोग
सड़क पर नाचने को अड़े थे
हमें लगा, गलत जगह आ गये
यहाँ तो
हो रही है कोई शादी
पता नहीं
कहाँ है फ़ेयरवैल पार्टी
हम ने एक लिपी-पुती
साड़ीधारी कन्या से पूछा
"आप क्या ज़रा
सड़क छोड़ कर नाच लेंगी
और हमारी
एक दुविधा दूर कर सकेंगी
शायद कार्यक्रम कुछ बदल गया है
आपको पता है,
हमारे फ़ेयरवैल का वेन्यू क्या है" ?
एक नाचता सूटधारी बोला -
"सर, पहचाना नहीँ,
बस हमारा गेट-अप नया है
मैं आपका शिष्य हूँ,
और वो साड़ीधारी आपकी शिष्या है" ।

हम आगे बढ़े, और पूछा -
"बाकी के टीचर्स कहाँ हैं" ?
उत्तर मिला - " बस वहीं हैं
अपने स्टूडेण्ट जहाँ हैं
गये हैं उनको मनाने
और ज़रा जल्दी बुलाने
टीचर्स अगर धकेलने और
हाँकने को न जाते
तो छात्र सी.सी. से ओ.ए.टी. तक
आने में पूरे तीन घण्टे लगाते "।

अंततः बारात लगी
शुरू हुआ कार्यक्रम
होने लगे डाँस पर डाँस
धम धमा धम
फिर टाइटल दिये जाने लगे
बहुत से लोग मिल कर
एक को स्टेज तक पहुँचाने लगे
स्टेज पर ये सब,
उस एक को
कई बार उछाल देते
बेचारे के शरीर के
सारे कस-बल निकाल देते
जनता ये सारे
करतब देख घबराई
और हमें
बनती हुई रूमाली रोटी याद आई

कार्यक्रम चलता ही गया,
चलता ही गया
कभी न खतम होने वाले
टी.वी. सीरियलों की तरह
बढ़ता ही गया
मच्छरों ने हम पर,
हजारों हमले किये मनमाने
पर हम भी क्या चीज़ हैं
बस, डटे रहे सीना ताने

सुबह होने को आई
तो नाचते हुए लोगों से की दुआ
"अब बस करो भाई लोगो
सचमुच में बहुत हुआ" ।
पर वाह रे
अनूठे बिदाई बुखार
लोग सुनने को
थे ही नहीं तैयार
हम सोचने लगे -
क्या किया जाये
अचानक सूझा
एक सरल उपाय
छात्राओं को
बुला कर कहा - चलो, निकलो
हर एक छात्रा रजामन्द हो गयी
अगले दस मिनट में
लड़कों की डाँस पार्टी बन्द हो गयी

पड़ोस का रिक्शावाला
बैठा था हताश-उदास
हमने पूछा - "क्या
आज रात का कार्यक्रम
नहीं हुआ देवदास ?
बड़े दुखी दिख रहे हो
तुम आज रात
पैसे नहीं हैं,
या और कोई है बात" ?
उसने कहा - "पैसों की तो आज
हुई है बरसात
किल्लत वाली आज,
नहीं है कोई बात
हफ़्ते भर से बैठे
सूख रहे हैं इन्तज़ार में
फ़ेयरवैल वालों ने एक भी
बोतल नहीं छोड़ी है बाजार में "।

मुझे छोड़िये, वहाँ जाइये
देखिये,
आपके कुछ छात्र रो रहे हैं
बिछड़ने के गम में
सब को आँसुओं में डुबो रहे हैं
जाइये, समझाइये
दूर कीजिये उनकी उदासी
वरना आँसुओं की बाढ़ में
डूब न जायें भिलाईवासी" ।

हमने कहा -
"ये बी.आई.टी. वाले हैं
इनके आँसुओं में भी दम है
बी.आई.टी. का कौन
दुनिया में किसी से कुछ कम है" ?

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-------------------- अमिताभ मिश्र